Thursday, December 31, 2009

नित नवीन सृजन करे.....!

नव वर्ष नव कल्पना 
नित नवीन सृजन करे ।

खिले फुल महके गुलशन 
सरस किरणों का स्वागत करे ......................!
गुजित भंवरे,गुनगुन स्वर 
रिमझिम फूहार की कामना करे 
जीवन हो सरल
दिशायें दीप्तमान नवीन प्रहर का इन्तजार करें........!  
नव वर्ष नव कल्पना 
नित नवीन सृजन करे
दुख भ्रम की किचिंत छाया न हो
सुखों की अल्पविराम रागिनी हो
एक नवगीत को साज आवाज दे........................!
नव वर्ष नव कल्पना 
नित नवीन सृजन करे। 

Monday, December 21, 2009

खुदाया मुझे रहमतो का एक समुन्दर दे दे.................


खुदाया मुझे रहमतो का एक समन्दर दे ............
डूब जाउ मै तेरी इबादत में इतना
के कोई मुझे हटा न सके।
खुदाया मुझे उजली धुप का आंगन दे दे।
रख सकूं हर एक महरूम हो चुके, खुशी से बन्दे को 
एक जमी ऎसी जहां नफरत
पांव न जमाती हूं सिर्फ तेरी नूर से सरोबार दीवारे हों

खिलते हो फूल चट्टानों पर भी
मुस्कुराता एक गुलशन दे दे।
वो जो देखा था अक्स तेरा
हर दीदार में वो नजर दे दे।
तेरी इबादत में लूटा दूं अपना सबकुछ
तू सिर्फ एक झलक दे दे।
खुदाया मुझे रहमतों का एक समुन्दर दे दे...............।

Tuesday, December 15, 2009

धुंध.............

धुंध- धुंध, धुआ- धुआ.........।
जिन्दगी बढती गयी
कांरवा चलता गया
दूर तक खामोशी और साये
आहटे बढती हौले हौले............।

रफ्तार जो थमती नही 
आसुओ की रौ
तन्हाईया शोर मचाती है।
सारी परेशानियों का सबब
ऎ दिल अब तो संभल
बहके कदमों को संभाले
चलते रहे बस चलते रहे...........।
किसकों पुकारे इस राह पर
देखो कितना अंधियारा है
रफता रफता वक्त कटता
गुम होता उजियारा.........।
पुरवाई से कहो यहां न आये
तेरा दर यहां से दूर है।
दबे पांव मुस्कुराते है हौठं 
मुस्कुराहट बैरी है।

धुंध-धुंध धुआ -धुआ................।

Saturday, December 12, 2009

एक शाम .......

एक शाम और तुम, दोनो कितने करीब हैं।
किसे भूले किसे याद करे
दोनो मेरे अपने है........

डुबता सूरज और समन्दर
जैसे डुबती हर सांस है
एक पल और एक गम
दोनो मेरे अपने है.............
किसे भूले किसे याद करे
फासले बढते जाते है

रह नुमा वो नही 
सैलाब है हर तरफ
अंधियारा घिर आये............
कैरे सवेरे की राह तके
किसे भूले किसे याद करे 
वक्त बहा ले जाता है.............................
गम एक दरिया,
मौजो का आना जाना 
एक बूत और चट्टान 
किसे भुले किसे याद करे.....................।
            _______

Monday, November 30, 2009

उडान

बन्द होती सांसे
यूं जीना भी कोई जीना है
फडफडाते है पंख छूने को आकाश नये
कुतरे पंख कैसे काई उडान भरे........ !

नन्ही चीडियां रश्क तूझसे 
मिला खुला आकाश तूझे
हवा भी कुछ कहती हौले-हौले......  !
टूटते बांध आशाओं के
बन्द हो जाते  दरवाजे खुलने वाले
एक मंजिल पा कर मंजिलों से दूरी है...... !
उम्मीद कहती हौले से कानों में
तू क्योकर उदास है कोई सवेरा
कोई सहर दाखिल होती ही है
सफर बोझिल जरूर पर कट तो रहा है....... !
कतरे पंख ही सही उडान तो भर 
आस मां देखता है राह तेरी
बंधी मुठ्रठी खोल तो जरा
फिर न कहना कही रोशनी नही...... !
एक दीप जला तो जरा
पग पग धर, धरा नप जाये
हौसला कर कदम तो बढा....................!
       _______

Friday, November 20, 2009

आखिर कब तक सहूंगी.....(.अन्तिम भाग) जागरूकता व बचाव

जब घर में ही हिंसा की शिकार महिलाओं से मैने उनके विचार जानने चाहे किसी भी आम हिन्दुस्तानी औरतों की भांति ही उनके विचार थे यह कहना है आखिर हम आवाज उठाये तो किसके खिलाफ जा उनका पति या परिवार है चाहे वो भाई  हो या अन्य काई पति से जन्मजन्मातंर का रिश्ता होता है  वह उनके खिलाफ कैसे जा सकती है मेरी एक परिचिता जो पेशे से डा0 है खुद कहती है कि कुछ रिश्ते ऎसे होते है जेसे पति ,भाई कोई महिला इनसे लड नही सकती इनकी बातो को सहने के अलावा उनके पास अन्य कोइ रास्ता नही होता।इसलिए विरोध करने से अच्छा या तो अनुसरण करो या फिर सहते रहो।

यह तो बात रही सहन करने की,लोगो का भी यह मानना है जो सहते है घर भी उन्ही के बचे रहते है जो नही सह पाते उनके घर बिखर जाते है क्योकि यदि घरेलू हिंसा को रोकने में जब कानून का सहारा लिया जाता है तब दौर शुरू होता है टूटने व बिखरने का काई भी व्यक्ति यह विश्वास नही कर पाता कि पीडित या पीडिता यदि कानून की शरण मे गयी है तो फिर रिश्ते समाप्ति के कगार पर आ पहुँचते है यदि कानून द्वारा रिश्तों  का बरकरार भी रखा गया तो वह आपसी प्रेम का नही दबाव का नतीजा होता है कि रिशता बना है दिल मे प्यार व इज्जत तो खत्म हो ही जाती है । यहां प्रश्न यह उठता है कि रिश्तों में घरों में पनपती हिंसा को कैसे रोका जाये?
जहां तक मेरा दृष्टि कोण है  विवाह के उपरान्त यदि आपस में हिंसा तो इससे अच्छा है पहले व्यक्ति की चाहे वह रूत्री हो या पुरूष उसके व्यवहार की भी जांच की जाये जिस तरह माता-पिता द्वारा वर-वधु की दूसरी तमाम बातों की पडताल की जाती है उनका जिक्र मै यहां नही कर रही हू जिसे सभी परिचित ही है। अगर कभी तकरार हो भी जाये तो बजाये उसे मार-पीट के आपसी समझदारी व बातचीत के जरिये सुलझाये मानसिक स्तर पर भी ताने आदि न दे कर प्रताडित न करे क्योकि मन के घाव शरीर के घावों से भी भयानक होते है।यदि किसी की काई बात या आदत पसन्द न हो तो उसे मुददा न बनाये क्योकि आदतें एक दिन में नही जाती किसी को बदलने के लिए वक्त , प्यार एंव समझाने के तरीके पर बहुत कुछ निर्भर करता है। रिश्तों मे पैसे को अहमियत न दें न ही आर्थिर रूप से एकदुसरे के कमजोर होने पर झगडने के बजाये अन्य विकल्प खोज सकते है ध्यान दूसरी तरफ लगाये न की झगडों पर यदि काई ऎसा शख्स है जो आपके बीच झगडो को जन्म देता हूं बेहतरी इसी मे है उससे दूर ही रहे।

विवाह उपरान्त किसी भी वधु के उपर ससुराल पक्ष का काई भी व्यक्ति यदि विवाद में हाथ उठाये तो प्रतियुत्तर में उसके इस कृत्य को पहली ही बार में रोक दे यदि सम्मान वश या कमजोरी वश आप ऎसी नही करते तो फिर सारी उम्र सहन करन के अलावा आपके पास कोई रास्ता नही होता इसमें वर या वधु के परिवार को भी साथ देना चाहिए न की हिंसा करने वाले से डर कर या मान- सम्मान के डर से चुप रह जाये हिंसा करने वाला इसे अपनी जीत समझ कर और भी क्रूर हो जायेगा वह बार बार आपके साथ वही सलूक करेगा कहते है न इलाज से अच्छा होता है बचाव करना इसलिए अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला भी उतना ही बुरा होता है जितना अन्याय करने वाला।  हिंसा को तुरन्त ही रोका जाये यही इसका कारगर उपाय है न की उस पुरानी कहावत में की ससुराल से लडकी की डोली जाती है तो अर्थी भी वही से उठे यह एक दम घटिया व सडी गली मानसकिता है जिसका मै तो पुरजोर विरोध करती हूं किसी भी लडकी के लिए ससुराल उसका घर होना चाहिए जहां वह खुल की जी सके न की अपनी मौत का इन्तजार करे।किसी लडकी को भी यह चाहिए की वह ससुराल का सम्मान करे उसे अपनी शिक्षा गुणों से स्नेह से हर रिश्ते को सहेजे ताकि परिवार प्रेम व सौहार्द का माहौल रहे  की टी वी सीरियलों की देखा देखी अपने चरित्र को न ढालें ।
यदि परिवार में कोई है ही हिसंक प्रवृत्ति का तो उससे दुरी बनाये यदि सुधार की  तरकीब ही न हो तो घरेलू हिंसा के लिए कानून का सहारा लेने मे देर न लगाये किसी एक द्वारा की गयी हिंसा का असर दुरगामी हो सकता है जिससे बहुत से लोग इसकी दायरे में आ जाते है जिसका जिक्र मै अपनी पहले की पोस्टो आखिर कब तक संहूगी के भाग एक व दो में कर चुकी हो।स्कूलों में भी इन बातों की जानकारी देनी चाहिए जागरूकता किसी भी बुराई का बेहतर बचाव हो सकता है ।यदि किसी के घर में ऎसा हो भी रहा तो चुप रह कर तमाशा न देखे बुराई की अनदेखी बुरा्ई को बढावा, हमेशा याद रहे............।
written by Sunita Sharma (freelancer journalist)
( चित्र गुगल से साभार)                                                   _________________

Monday, November 16, 2009

आखिर कब तक सहूंगी......भाग दो

घरेलू हिंसा जो मुद्दा मैने उल्टा तीर पर उठाया किन्ही अपरिहार्य कारणो की वजह से उस ब्लाग पर नही पोस्ट कर रही हूं मैने आखिर कब तक संहूगी   शीर्षक से लिखी पोस्ट में मैने घरेलू हिसां के कारणो व प्रवृत्तियों पर लिखा जिसमें यह लिखा कि किस तरह घरेलू हिंसा का शिकार व्यक्ति अपने काम पर भी ध्यान नही दे पाता किस तरह घरों में रिश्तों के दौरान हिंसा पनपती है।

जहां तक मै समझती हूं कोई रिश्तों तब हिंसक हो उठता है जब उसे यह लगता है दूसरे को उसकी कोई परवाह नही जब पत्नियां पति पर हावी होने की कोशिश करे उसके परिवार की इज्जत न करे व उसे पलट कर जवाब दे पति की अनदेखी आथिर्क तंगी पति या पत्नी का अन्यत्र रूचि लेना। इसी तरह  काई महिला भी परिवार भी तभी हिसंक होती है जब उसकी उपेक्षा हो या उसका व्यवहार ही इस तरह का हो, दंबग होना अपना रोब व परिवार में अपनी तानाशाही चलाना ,किसी भी व्यक्ति के हिंसक होने के पीछे वो मनोवेग भी कारण होते है जिन से वह आये दिन गुजरता है ,सबसे अहम रोल होता है माहौल का जिससे बच्चे ,बूढे ,रूत्री पुरूष सभी प्रभावित होते है।


परिवार में यदि काई  कानून का सहारा भी लेता है इसमें भी परिवारों की जगहंसाई ही होती है और जो रिश्ते प्रेम व सौहार्द से जुडे वह उस हिसां की वजह से टुट जाते है क्योकि जब सहन नही होता तो परिवार मे विच्छेदन की प्रक्रिया आ जाती है ।हिसां किसी भी रूप में भयानक है घरों में तो यह और भी बुरी जो लोग इसकी जगह परिवार में या रिश्तों में रखते है वह एक तरह का अपराध तो करते ही है साथ ही इसका खामियाजा बहुत से लोगो को भुगतना पडता है ।इसके लिए मै एक उदाहरण देती हूं एक प्रतिष्ठत परिवार की बहु मायके चली गयी जब काफी दिनों तक वह वही रही तो लोगो को पता चला कि उसने ससुरालवालों पर केस किया था दहेज व मारपीट का उसका आरोप था कि उसे ससुराल वालों ने मारा पेट पर लातें लगने की वजह से उसका बच्चा मर गया । आखिर जिस प्यार से काई शादी करता है तो फिर जिस लडकी को घर बसाने के लिए लाया जाता है उसी को मारा पीटा क्यों जाता है। इसके पीछे काम करता है कोई स्त्री रूपी एक स्त्री की दूसरी स्त्री की जलन का भाव उसकी यही भावना दूसरी स्त्री के लिए पुरूष को उकसाने का भाव होता है।


इसके लिए एक अन्य उदाहरण मै बताती हूं हमारे पडोस में  एक सुन्दर सुशील लडकी का विवाह माता-पिता द्वारा द्वान दहेज दे कर करा जाता है पर जब लडकी विवाह के बाद फेरा डालने घर आती है तो उसके माथे पर चोट थी जिसे घर के लोगो ने छिपाया बाद में पता चला लडकी की पति ने लडकी को पहले ही दिन मारा उसकी शादी दबाव में थी वजह लडके के उसकी भाभी से अवैध सम्बंध ।लेकिन इसमें उस लडकी का क्या कसूर जो शादीशुदा होकर भी काई सुख न पा सकी जल्द ही पिता ने तलाक करवाया ।लडकी कई दिनो तक मानसिक अवसाद में रही।


ऎसे लडके की शादी ही क्यों की जो पहले से एक गलत रिश्ते में था उसका खामियाजा उस बेकसुर लडकी को भुगतना पडा आखिर उसकी क्या गलती थी जो आज एक परित्यक्ता का जीवन जी रही है।
उस पर उसे उस हिसां को भी झेलना पडा जिसके लिए वह कही से भी कसूरवार नही थी ।पहले उदाहरण में शिकार बना वो अजन्मा बच्चा जिसे दूनिया में आने से पहले ही जाना पडा वजह मां पर की गयी हिंसा उदाहरण बहुत है पर सवाल वही आखिर मार-पीट या हिंसा शारीरिक हो या मानसिक एक अपराध तो है ही साथ ऎसा अनैतिक कृत्य है जिसका होने से उसे झेलने वाले व करने वाले दोनो ही दुखी रहते है फिर बचाव क्या हो।इसके बचाव के उपायों पर मै आगे की पोस्ट पर चर्चा करूगी ............। पढते रहिए अभी जारी है। 

Sunday, November 15, 2009



कुछ भी न कह कर बहुत कुछ कह जाते है
सबने सताया जी भर कर, अब तो गमों 
को भी शर्म आती है हम पर!
आदत जो होती है उसे मिटा ना
कैसे कत्ल होता है अरमानों का
देखो फितरत दूनिया कितनी मासूम है !
बांध  कर हाथों को क्या तलाश है
वो मुकाम कहा रास्ता कहां
कुछ भी न कर कह कर बहुत कुछ कह जाते है।
हमने बना दिया मूरत को भी इन्सा 
है काफी दम खम हममें
वो छीन लेता है हर खुशी मुझसे 
कैसा  हमसफर है मेरा
मार डालता है कहकर, जिन्दगी 
दे रहा हूं तूझे !

Tuesday, November 3, 2009



मासूम चेहरो से, डर लगता है
इनकी तल्खी, शोखिया, अदाये
होती है कातिलाना
चेहर, जो चलाते है नश्तर
कैसे कहूं इन नश्तरों से डर लगता है
मासुम आंखे दिलों में चलाकिया
चलाकियों से, डर लगता है!
कत्ल कर जाते है खामोशी से
उफ! भी नही जरा,
मासूम चेहरो से दूर रहना है
इनकी जिदे ,इनकी दीवानगी
रो कर हर बात मनवा लेना
चेहरों ने गुनाह करवाये है !
आइना दिखा देता है फितरत एक दिन
सौ बार जो मुंह छिपाये है !
मासूम चेहरों से डर लगता है !
होती है इनकी बाते निराली
हर शह को दूर कर दो
चेहरों पर लगे है चेहरे ,
बन्द कर लिया है आंखो को
हां ! मासूम चेहरों से डर लगता है......।

Friday, October 30, 2009


हर रोज एक नया गम दो
मुझे गमों  की आदत है
आज  ये पास नही..... ....  !
ये क्योकर मुझसे दुर है
बस पत्थर ही मारों दोस्तो
न ही मैं नूर हूं न  ही सरूर हू!
कही उठा कर एक कोने में रख दो दोस्तों
किसी की ग़ल्तियाँ और माफ़ी ?
 जमी मेरे किस काम की!
दूर फलक पर घर बना दो
मुझे एक चादर सिला दो
आओ गले लगा लू तुम्हें!
पल भर भी दुर न हो
क्या ढुढता है अब ये दिल
साया भी जुदा हो चुका है दोस्तों !
उसके सितम की कोई
हद तो होगी,अब तो सितमों
शह ढूढंता हू दोस्तों........!
              -----------

Wednesday, October 28, 2009



आज फिर दिल रोया है बार-बार
छलछलाते अश्क कह देते हर बात
जख़्मी सांस, क्यो फरेब सहता है मन?
क्या है रोक लेता है जो कदमों को  बार-बार
किस तरह खेलते है लोग दिलों से
कर देते है बस चकनाचुर
आज फिर गमों का दौर आया है 
हसरतों का टूटना ,बिखरना 
मरना फिर जी लेना 
ख़ुशियों क्यों छीन लेते है लोग
क्यों नही समझ पाता कोई मन?   
आज फिर दिल टुटा है
यहां आवाज़ नही साज़ नही
खामोशी ओर बस  घुटन.................... 

            ---------

Friday, October 23, 2009

तुम !

हौले से आकर जगा देते हो मुझे
ख्वाब में ही सही,उपस्थित दिखा देते हो तुम
तुम जो अरमान थे, तुम जो जीवन थे!



आज जो अभिशाप बन गये हो तुम
हौले से आकर कानों में कुछ कहते हो तुम
बुदबुदाते शब्द बनते जाते कहर!


उपर एक आसमां, क्या तलाशतें हो तुम
हौले से चैन छीन लेते हो तुम
झुठे ही सही ,तसल्ली दे जाते हो तुम !


तुम जो विश्वास थे, छल जो बन गये तुम
क्या करे अब परिभाषित, भुल जाओ तुम 
प्रेम जो सच था उसे खो  चुके तुम !
          _________

Sunday, October 18, 2009

क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम.....?




क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम
किन लोगो मे जीवन गुजारते है हम
रिश्ते जो सिर्फ देते है दर्द उन रिश्तों 
क्या सोच निभा रहे है हम
खुन जो हो जाता है  पानी है
 क्षणिक स्वार्थ कर देता है सब होम
दुहाई देते रहे बस, क्या मेरा क्या पराया
क्यो रिश्तों को तिथियों में बांध देते है हम
झलकता जो प्रेम आंखों से नफरत कैसे सह पाते हम
क्यों रिश्तों को रो लेते है हम 
इन्सानों की इस दुनिया में 
लेन देन कर बना लेते फरेब की एक दुनिया
दुनियादारी का नाम ले रिश्तों को तोल लेते हम
 क्यों रिश्तों के नाम पर ठोकरे खा रहे है हम
जो आज है वो कल न होगा 
तकलीफों को सहन कर क्यों जिये जा रहे है हम।
                ____________

Wednesday, October 14, 2009

कुछ कहता दिया बाती संग

कुछ कहता है दिया बाती से कुछ कहती बाती दिये से !
दोनो ही जलते तपते है
साथ जलते साथ बुझते 
अनबुझ एक पहेली से
  दिया रोशन बाती संग बाती रोशन दिये संग !
अलग हो जैसे अंधेरे से 
निश्वान जैसे  प्राण बिन
एक साथ जलना नियती इनकी 
न करो अलग दिये संग बाती को
 दिया झिलमिल बाती संग झिलमिल दीपकतार!
साथ दोनो यूं दमकते 
लगते  टिम टिम जुगनू से 
मुस्कुराता मानो देख बाती को
 दिया है मानो बाती रंग
न करो अलग दिये संग बाती को !
      ____________

Sunday, October 4, 2009

एक ख्याल हुं मै ।

कोई मुझसे कहे कौन हुं मै, एक ख्याल हुं बस
ख्यालो का काई नाम नही़, नही कोई रंग रूप
के बस ख्याल हूं मै
कभी आना कभी जाना, है फितरत इसकी
ख्याल का कोई नाम नही, नही रंग रूप 
के बस एक ख्याल हुं मै
कोई मुझसे कहे तेरी चाहत क्या है
बस दफन होना 
न पूछे कोई मेरा हाल क्या है
के बस ख्याल हूं मै
झूठ फरेब की इस दूनिया मै कोई
हिमाकत करू ऎसी नही औकात मेरी
कोई मुझसे पुछे कहां है घर मेरा 
वो बसेरा ठुकरा दिया हमने
के बस ख्याल हूं मै।
ख्यालों का कोई पडाव नही
टुटना बिखरना जन्म उनका

फिर क्यू शिकायत 
ख्याल का कोई नाम नही , नही रंग रूप
के बस एक ख्याल हूं मै
जाने अन्जाने ही आ जाऊ दिल में तो
अफसोस न करना 
इतनी जल्दी मिट न पायेगी हस्ती मेरी
रह रह कर कचोटना
है आदत मेरी
के बस एक  ख्याल हुं मै
बन्द कर लो अपनी आंखे
हाजिर मुझे पाओगे
तुम कहो और मै चला जाऊ
तुम्हारे जहन के सिवा कहां है
बसेरा मेरा, कह दो चला जाउगा
गल्ती से फिर आ जाऊ तो मुझे कुछ न कहना
के बस एक ख्याल हुं मै।

                                     ________________

बेझिझक सी तरन्नुम में यह दौर कैसा है....


बेझिझक सी तरन्नुम में ये दौर कैसा है
क्या सोचे हम क्या कहे अब सब कुछ फीका है।
मायुस होता है मन है बेचैन भी
देख खाली हाथों को कितने व्याकुल है हम
बेबसी को क्या दूसरा नाम दूं
जो नही अपना उसे कैसे अपना कहु
क्या सोचे क्या कहे हम अब सब कुछ फीका है ।
आरजू क्या चाहती है देख ये पागलपन
न कहो उसको कुछ भी वो एक भंवरा है
उसकी आंखो की चमक को क्या नाम दे हम

लुटाने बैठा है जो अपनी हस्ती आज
रोक लो उसको बर्बादियों के कहर से
क्या सोचे क्या कहे हम अब सबकुछ फीका है।



































Friday, October 2, 2009

पलकें क्यों झुक जाती है?



Posted by Picasaपलकें क्यों झुक जाती है
क्यों बुदें झलक जाती है?
कहते ही शब्द बोझिल होता है, मन
फिर खामोश होता है कही कोई अंर्तमन
मीलों तलक लम्बी दूरी..............

देखो आेसं सी छलक आयी है
मेरा दामन उडने लगा बस युं ही
कह दुं क्या तोड के सारे बन्धन?
इन्द्रधनुष सा है मन
संतरगी ख्वाब दुर तक............

चुप क्यू हो ,दिन फिर न होगा
ये उडते बादल खो जायेगे
रहेगा विश्राम यू ही?
तेरे मेरे बीच के भेद
शोर मचायेगे दूर तलक............

     __________

Saturday, September 26, 2009



          महकती रहों तुम ,नन्ही कली मेरे बगिया की.....
      
          युं जैसे महकती है रात की रानी
          तुम मेरे जीवन की आधार हो
          तुम बिन थी कितनी अधूरी!
        
          महकती रहों तुम ,नन्ही कली मेरे बगिया की.....

                                                                                

महकती रहों तुम नन्ही कली मेरी बगिया की........

जैसा मैने सोचा तुम हो नितांत वैसी ही
तुम्हारा हंसना, जैसे जान हो मेरी
तुम्हारा रोना, लगता ले लेगा प्राण मेरे!

महकती रहो तुम,नन्ही कली मेरी बगिया की.......
जीवन था जो रसहीन तुमने
अपने कदमों की आहट से
मेरे हर क्षण को कर दिया जीवन्त मानो!

महकती रहो तुम,नन्ही कली मेरी बगिया की.......

              ____________
        

कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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