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उडान

बन्द होती सांसे
यूं जीना भी कोई जीना है
फडफडाते है पंख छूने को आकाश नये
कुतरे पंख कैसे काई उडान भरे........ !

नन्ही चीडियां रश्क तूझसे 
मिला खुला आकाश तूझे
हवा भी कुछ कहती हौले-हौले......  !
टूटते बांध आशाओं के
बन्द हो जाते  दरवाजे खुलने वाले
एक मंजिल पा कर मंजिलों से दूरी है...... !
उम्मीद कहती हौले से कानों में
तू क्योकर उदास है कोई सवेरा
कोई सहर दाखिल होती ही है
सफर बोझिल जरूर पर कट तो रहा है....... !
कतरे पंख ही सही उडान तो भर 
आस मां देखता है राह तेरी
बंधी मुठ्रठी खोल तो जरा
फिर न कहना कही रोशनी नही...... !
एक दीप जला तो जरा
पग पग धर, धरा नप जाये
हौसला कर कदम तो बढा....................!
       _______

Comments

  1. कतरे पंख ही सही उडान तो भर
    आस मां देखता है राह तेरी
    बंधी मुठ्रठी खोल तो जरा
    फिर न कहना कही रोशनी नही...... !

    बहुत खूब। सकारात्मक रचना।
    अच्छी सोच पर्दर्शित की है सुनीता जी।

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  2. Meri kavita ki utni samajh nahi hai par keh sakta hoon ki yeh behatrin hai.aise hi likhti rahe mam aur apni comments se doosro ko protsahit kare

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  3. वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।

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  4. बहुत अच्छी रचना है। भाव, विचार और शिल्प सभी प्रभावित करते हैं। सार्थक और सारगर्भित प्रस्तुति ।

    मैने अपने ब्लग पर एक कविता लिखी है-रूप जगाए इच्छाएं-समय हो पढ़ें और कमेंट भी दें ।- http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

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  5. एक दीप जला तो जरा
    पग पग धर, धरा नप जाये
    हौसला कर कदम तो बढा...................
    बेहतरीन-आभार

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  6. बहुत खूब। सकारात्मक रचना।

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  7. वाकई बहुत अच्छी रचना ।

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  8. Bahut sundar,sakaratmak rachna..."mushkil sahee,manzile jaanib qadam to badha!"

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  9. कतरे पंख ही सही उडान तो भर
    आस मां देखता है राह तेरी
    बंधी मुठ्रठी खोल तो जरा
    फिर न कहना कही रोशनी नही...... !
    एक दीप जला तो जरा
    पग पग धर, धरा नप जाये
    हौसला कर कदम तो बढा.......
    !!साहस बंधाती सुन्दर रचना

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  10. कतरे पंख ही सही उडान तो भर
    आस मां देखता है राह तेरी
    बंधी मुठ्रठी खोल तो जरा
    फिर न कहना कही रोशनी नही...... !
    एक दीप जला तो जरा
    पग पग धर, धरा नप जाये
    हौसला कर कदम तो बढा....................!
    _______
    इसी हौसले की तो ज़रूरत है.

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