Tuesday, November 3, 2009



मासूम चेहरो से, डर लगता है
इनकी तल्खी, शोखिया, अदाये
होती है कातिलाना
चेहर, जो चलाते है नश्तर
कैसे कहूं इन नश्तरों से डर लगता है
मासुम आंखे दिलों में चलाकिया
चलाकियों से, डर लगता है!
कत्ल कर जाते है खामोशी से
उफ! भी नही जरा,
मासूम चेहरो से दूर रहना है
इनकी जिदे ,इनकी दीवानगी
रो कर हर बात मनवा लेना
चेहरों ने गुनाह करवाये है !
आइना दिखा देता है फितरत एक दिन
सौ बार जो मुंह छिपाये है !
मासूम चेहरों से डर लगता है !
होती है इनकी बाते निराली
हर शह को दूर कर दो
चेहरों पर लगे है चेहरे ,
बन्द कर लिया है आंखो को
हां ! मासूम चेहरों से डर लगता है......।

6 comments:

  1. MASOOM CHEHAROON SE DAR ACHCHHA LAGAA!!!

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  2. रचना मर्मस्पर्शी है और मानसिक परितोष प्रदान करता है।

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  3. चेहरों पर लगे है चेहरे ,
    बन्द कर लिया है आंखो को
    हां ! मासूम चेहरों से डर लगता है......।
    बेहतरीन लिखा है. वाकई मासूमों से नहीं बनावटी मासूम चेहरो से ही डरने की जरूरत है.
    बहुत खूब लिखा है.

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  4. बहुत सही बात कही है. आजकल असली और नकली में भेद करना ही मुश्किल हो गया है.
    बनावटी लोगों से दूर रहना ही अच्छा है.

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  5. एक सच को शब्दों में संवार कर रख दिया है जैसे!
    इस दर्द, इस घुटन और इन अहसासों के साथ जीना...!
    शाबाशी दी जाए यूं जीने की
    या फिर विद्रोह की भरी जाए कोई चिंगारी
    तेरे भीतर!
    --

    महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!

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  6. चेहरे तो बदलते रहते है .. डर तो उस चेहरे के पीछे उपरी मंज़िल पर स्थित दिमाग से लगना चाहिये ।

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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