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Showing posts from June 8, 2010

उस राह पर कैसे गुज़रे.................।

उम्मीदों से कहो दामन न छूटे...........जो दर खुला है खुदा का उस राह पर कैसे गुज़रे कितना सकूंन है तेरे दामन में के तू दिखता नही फिर भी मै तूझे महसूस करती हूं........... पवित्र कितनी तेरी जमीन है रूह को चैन बस तेरे पास ही मिलता है इबादत कैसे करू इस काबिल भी तो नही तूझ तक मेरी फरियाद पहुचे वजह भी तो नही........... उम्मीदों से कहो हार न माने जो सुनता है सबकी क्या वो यही कही है कैसे तूझे पा लूं अब आस को आस कब तक रहे जो दे मांगे जिन्दगी उसे मिलती नही तंग दिल बोझिल है जो वह ढोये चले जा रहे है................. जो दर खुला है खुदा का उस दर तक कैसे पंहुचे कितनी बार चाहा तू कैसे मिले पर सिर्फ उम्मीद और उम्मीद इसके सिवा कुछ नही .........................।