Sunday, November 15, 2009



कुछ भी न कह कर बहुत कुछ कह जाते है
सबने सताया जी भर कर, अब तो गमों 
को भी शर्म आती है हम पर!
आदत जो होती है उसे मिटा ना
कैसे कत्ल होता है अरमानों का
देखो फितरत दूनिया कितनी मासूम है !
बांध  कर हाथों को क्या तलाश है
वो मुकाम कहा रास्ता कहां
कुछ भी न कर कह कर बहुत कुछ कह जाते है।
हमने बना दिया मूरत को भी इन्सा 
है काफी दम खम हममें
वो छीन लेता है हर खुशी मुझसे 
कैसा  हमसफर है मेरा
मार डालता है कहकर, जिन्दगी 
दे रहा हूं तूझे !

4 comments:

  1. अब तो गमों
    को भी शर्म आती है हम पर!
    वाह , बिलकुल नयी पंक्तियाँ .

    वो छीन लेता है हर खुशी मुझसे
    कैसा हमसफर है मेरा
    मार डालता है कहकर, जिन्दगी
    दे रहा हूं तूझे !

    बेहतरीन.
    सुनीता जी, अभी मैं आप ही के ब्लॉग पर आ रहा था की आपकी टिप्पणी देखी.
    आभार आपके सुन्दर विचारों का.

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  2. कैसा हमसफर है मेरा
    मार डालता है कहकर, जिन्दगी
    दे रहा हूं तूझे !
    बहुत सुन्दर भाव है

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  3. इस रचना ने मन मोह लिया।

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  4. I am really oblieged for all who comment's on my
    writing,i write more when i got comments these are my insperitions,that courge me to write more and more, thanks a lot.......

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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