Wednesday, October 14, 2009

कुछ कहता दिया बाती संग

कुछ कहता है दिया बाती से कुछ कहती बाती दिये से !
दोनो ही जलते तपते है
साथ जलते साथ बुझते 
अनबुझ एक पहेली से
  दिया रोशन बाती संग बाती रोशन दिये संग !
अलग हो जैसे अंधेरे से 
निश्वान जैसे  प्राण बिन
एक साथ जलना नियती इनकी 
न करो अलग दिये संग बाती को
 दिया झिलमिल बाती संग झिलमिल दीपकतार!
साथ दोनो यूं दमकते 
लगते  टिम टिम जुगनू से 
मुस्कुराता मानो देख बाती को
 दिया है मानो बाती रंग
न करो अलग दिये संग बाती को !
      ____________

4 comments:

  1. दिया और बाती का यह संगम ही प्रकाश का जनक है । आपको दिवाली की शुभकामनायें ।

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  2. मुझे दुष्यंत जी का शेर याद आ गया " एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों /इस दिये मे तेल से भीगी हुई बाती तो है ।

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  3. शरद जी,
    मुझे आपका ब्लाग पुरात्ववेत्ता बहुत अच्छा लगता है मुझे खुद भी पुरानी विरासतों सभ्यताओ का समझने जानने का शौक है ऎसी ही कोशिशे मैने दैनिक जागरण मे लेखन के दौरान की थी मेरी आने वाली पोस्ट भी कुछ ऎसे ही तथ्यों को उजागर करने का प्रयास भर है। नजर डालते रहिएगा साथ ही सुझाव भी।......
    http://sunitakhatri.blogspot.com

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  4. बहुत अच्‍छा, प्रत्‍येक पंक्तियां कुछ कह रही हैं, झक्‍कास। अच्‍छा लिखा है।
    सुनील पाण्‍डेय
    इलाहाबाद
    09953090154

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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