Wednesday, October 28, 2009



आज फिर दिल रोया है बार-बार
छलछलाते अश्क कह देते हर बात
जख़्मी सांस, क्यो फरेब सहता है मन?
क्या है रोक लेता है जो कदमों को  बार-बार
किस तरह खेलते है लोग दिलों से
कर देते है बस चकनाचुर
आज फिर गमों का दौर आया है 
हसरतों का टूटना ,बिखरना 
मरना फिर जी लेना 
ख़ुशियों क्यों छीन लेते है लोग
क्यों नही समझ पाता कोई मन?   
आज फिर दिल टुटा है
यहां आवाज़ नही साज़ नही
खामोशी ओर बस  घुटन.................... 

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5 comments:

  1. इस कविता में , बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है।

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  2. ख़ुशियों क्यों छीन लेते है लोग
    क्यों नही समझ पाता कोई मन?
    आज फिर दिल टुटा है
    यहां आवाज़ नही साज़ नही
    खामोशी ओर बस घुटन......

    bahut achchi lagin yeh lines....


    bhaavnaon ko bahut achche se express kiya hai ......apne.....

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  3. मैं चाहूंगा कि और और और बेहतर तरीके से कहो...!

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  4. मर्मस्पर्शी रचना.
    एक उदासी जो गहरे तक उतर गई.

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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