Sunday, October 18, 2009

क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम.....?




क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम
किन लोगो मे जीवन गुजारते है हम
रिश्ते जो सिर्फ देते है दर्द उन रिश्तों 
क्या सोच निभा रहे है हम
खुन जो हो जाता है  पानी है
 क्षणिक स्वार्थ कर देता है सब होम
दुहाई देते रहे बस, क्या मेरा क्या पराया
क्यो रिश्तों को तिथियों में बांध देते है हम
झलकता जो प्रेम आंखों से नफरत कैसे सह पाते हम
क्यों रिश्तों को रो लेते है हम 
इन्सानों की इस दुनिया में 
लेन देन कर बना लेते फरेब की एक दुनिया
दुनियादारी का नाम ले रिश्तों को तोल लेते हम
 क्यों रिश्तों के नाम पर ठोकरे खा रहे है हम
जो आज है वो कल न होगा 
तकलीफों को सहन कर क्यों जिये जा रहे है हम।
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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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