Friday, February 18, 2011

मन से बोझिल है सारा जहां.....

मन से बोझिल है यह जहां सारा
चंचल कितना है यह मन.....
पल उडे ,पक्षी सी उडान 
पल में ठहरे यूं सागर सा
मन से चलता ,यह संसार
लडता है दिमाग .........
मन सा बावरा है क्या कोई
घबराता कभी तो कभी होता बचैन 
कभी प्रफुल्लित तो, नही कही चिन्ता........
कभी मरघट तो कभी महफिल.........
मन सा पागल कौन ।
लिखते कवि न जाने कितनी रचना
मन की थाह लेना न आसान
है यह रहस्य अनबूक्ष पहेली सा 
मन को पा सब को पा लो 
नही तो कौन जाने इस जग, जीवन में
 मन के मारो ने किये बडे बडे काम............।


Sunday, February 13, 2011

वो होठो से तो कुछ कहेगी नही.........।

वो होठो से तो कुछ कहेगी नही
देख मेरे हालात जाने क्या समझेगी........।
दूरिया आज क्यो है?
कल क्या था जो करीब थे............।
चुपके से छोड देगी मेरे दर को 
जाने कहां उसकी सहर होगी.........।
जो करते है अपनी खुशी कुर्बान 
क्या दूसरों को खुशी दे पाते है........।
करते है ढोग जीने का ढंग से मर भी नही पाते है.........।
वो कह देगी अलविदा
बदल कर अपना रस्ता 
मेरा सफर दोस्त कठिन जरूर है............।
यहां नफरत नही प्रेम से रोशन जहां है
एक दूनिया है ऎसी जहां मासूमियत है.........।
नही है चलाकियां दूनिया की
उससे कहो वह अपना रास्ता बदल दे.......।
गुमराह करे इससे पहले कोई उसे 
वापस उसका हसीन दूनियां में आने का इन्तजार है.........। 

कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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