Sunday, October 18, 2009

क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम.....?




क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम
किन लोगो मे जीवन गुजारते है हम
रिश्ते जो सिर्फ देते है दर्द उन रिश्तों 
क्या सोच निभा रहे है हम
खुन जो हो जाता है  पानी है
 क्षणिक स्वार्थ कर देता है सब होम
दुहाई देते रहे बस, क्या मेरा क्या पराया
क्यो रिश्तों को तिथियों में बांध देते है हम
झलकता जो प्रेम आंखों से नफरत कैसे सह पाते हम
क्यों रिश्तों को रो लेते है हम 
इन्सानों की इस दुनिया में 
लेन देन कर बना लेते फरेब की एक दुनिया
दुनियादारी का नाम ले रिश्तों को तोल लेते हम
 क्यों रिश्तों के नाम पर ठोकरे खा रहे है हम
जो आज है वो कल न होगा 
तकलीफों को सहन कर क्यों जिये जा रहे है हम।
                ____________

4 comments:

  1. किन लोगो मे जीवन गुजारते है हम
    रिश्ते जो सिर्फ देते है दर्द उन रिश्तों
    क्या सोच निभा रहे है हम
    खुन जो हो जाता है पानी है
    क्षणिक स्वार्थ कर देता है सब होम
    दुहाई देते रहे बस, क्या मेरा क्या पराया
    क्यो रिश्तों को तिथियों में बांध देते है हम

    kyaa bat hain ek dard hain in lines mai jo kabhi aapna sa lagta hain....sayd tabhi koi rachna chuupaty hain anteh man ko..

    bahut achaa..
    jara
    google tool ki galtiyon ka dhyan rakhe..jaise khun ko khoon kariyen.....to or behtar lagega..
    bahut bhadhayee

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  2. रिश्ते निभाना हमारी संस्कृति का अंग रहा है.
    लेकिन अब सोच बदल रही है.
    बेमानी रिश्तों की अब कोई ज़गह नहीं.
    फेस्टिवल सीजन की शुभकामनाएं.

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  3. सुनीता जी कविता मे लय का होना बहुत ज़रूरी है , एक बार फिर से देखें ।

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  4. नही जानती कविता क्या होती बस कभी जब कुछ देख कर महसूस कर जा मनोभाव होते वही सबके साथ बांटने की कोशिश है यह तो वही जाने के पढने के बाद उन्हें क्या लगता है.......

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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