Sunday, February 21, 2010


जख्म अब हंसते है
न जाने मुझसे क्या चाहते है।
हंसी है लबों पर फीकी सी 
 मायूसियो के दौर रहते है
जिन्दगी को खेल समझा
खिसकते पल हाहाकार 
करते है, थोडा ठहर जा वक्त
अभी सांस तो ले लूं
न बुलाओ मुझे 
चन्द लम्हे तो जी लूं
क्या है फलसफा जब
चाहो तो नही मिलता 
न चाहो तो सब कुछ पास तुम्हारे
नियति तेरे खेल न्यारे 
तुने खुब ठगा है
अब जख्म मुझ पर ही चिल्लाते .............है

कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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