Friday, November 20, 2009

आखिर कब तक सहूंगी.....(.अन्तिम भाग) जागरूकता व बचाव

जब घर में ही हिंसा की शिकार महिलाओं से मैने उनके विचार जानने चाहे किसी भी आम हिन्दुस्तानी औरतों की भांति ही उनके विचार थे यह कहना है आखिर हम आवाज उठाये तो किसके खिलाफ जा उनका पति या परिवार है चाहे वो भाई  हो या अन्य काई पति से जन्मजन्मातंर का रिश्ता होता है  वह उनके खिलाफ कैसे जा सकती है मेरी एक परिचिता जो पेशे से डा0 है खुद कहती है कि कुछ रिश्ते ऎसे होते है जेसे पति ,भाई कोई महिला इनसे लड नही सकती इनकी बातो को सहने के अलावा उनके पास अन्य कोइ रास्ता नही होता।इसलिए विरोध करने से अच्छा या तो अनुसरण करो या फिर सहते रहो।

यह तो बात रही सहन करने की,लोगो का भी यह मानना है जो सहते है घर भी उन्ही के बचे रहते है जो नही सह पाते उनके घर बिखर जाते है क्योकि यदि घरेलू हिंसा को रोकने में जब कानून का सहारा लिया जाता है तब दौर शुरू होता है टूटने व बिखरने का काई भी व्यक्ति यह विश्वास नही कर पाता कि पीडित या पीडिता यदि कानून की शरण मे गयी है तो फिर रिश्ते समाप्ति के कगार पर आ पहुँचते है यदि कानून द्वारा रिश्तों  का बरकरार भी रखा गया तो वह आपसी प्रेम का नही दबाव का नतीजा होता है कि रिशता बना है दिल मे प्यार व इज्जत तो खत्म हो ही जाती है । यहां प्रश्न यह उठता है कि रिश्तों में घरों में पनपती हिंसा को कैसे रोका जाये?
जहां तक मेरा दृष्टि कोण है  विवाह के उपरान्त यदि आपस में हिंसा तो इससे अच्छा है पहले व्यक्ति की चाहे वह रूत्री हो या पुरूष उसके व्यवहार की भी जांच की जाये जिस तरह माता-पिता द्वारा वर-वधु की दूसरी तमाम बातों की पडताल की जाती है उनका जिक्र मै यहां नही कर रही हू जिसे सभी परिचित ही है। अगर कभी तकरार हो भी जाये तो बजाये उसे मार-पीट के आपसी समझदारी व बातचीत के जरिये सुलझाये मानसिक स्तर पर भी ताने आदि न दे कर प्रताडित न करे क्योकि मन के घाव शरीर के घावों से भी भयानक होते है।यदि किसी की काई बात या आदत पसन्द न हो तो उसे मुददा न बनाये क्योकि आदतें एक दिन में नही जाती किसी को बदलने के लिए वक्त , प्यार एंव समझाने के तरीके पर बहुत कुछ निर्भर करता है। रिश्तों मे पैसे को अहमियत न दें न ही आर्थिर रूप से एकदुसरे के कमजोर होने पर झगडने के बजाये अन्य विकल्प खोज सकते है ध्यान दूसरी तरफ लगाये न की झगडों पर यदि काई ऎसा शख्स है जो आपके बीच झगडो को जन्म देता हूं बेहतरी इसी मे है उससे दूर ही रहे।

विवाह उपरान्त किसी भी वधु के उपर ससुराल पक्ष का काई भी व्यक्ति यदि विवाद में हाथ उठाये तो प्रतियुत्तर में उसके इस कृत्य को पहली ही बार में रोक दे यदि सम्मान वश या कमजोरी वश आप ऎसी नही करते तो फिर सारी उम्र सहन करन के अलावा आपके पास कोई रास्ता नही होता इसमें वर या वधु के परिवार को भी साथ देना चाहिए न की हिंसा करने वाले से डर कर या मान- सम्मान के डर से चुप रह जाये हिंसा करने वाला इसे अपनी जीत समझ कर और भी क्रूर हो जायेगा वह बार बार आपके साथ वही सलूक करेगा कहते है न इलाज से अच्छा होता है बचाव करना इसलिए अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला भी उतना ही बुरा होता है जितना अन्याय करने वाला।  हिंसा को तुरन्त ही रोका जाये यही इसका कारगर उपाय है न की उस पुरानी कहावत में की ससुराल से लडकी की डोली जाती है तो अर्थी भी वही से उठे यह एक दम घटिया व सडी गली मानसकिता है जिसका मै तो पुरजोर विरोध करती हूं किसी भी लडकी के लिए ससुराल उसका घर होना चाहिए जहां वह खुल की जी सके न की अपनी मौत का इन्तजार करे।किसी लडकी को भी यह चाहिए की वह ससुराल का सम्मान करे उसे अपनी शिक्षा गुणों से स्नेह से हर रिश्ते को सहेजे ताकि परिवार प्रेम व सौहार्द का माहौल रहे  की टी वी सीरियलों की देखा देखी अपने चरित्र को न ढालें ।
यदि परिवार में कोई है ही हिसंक प्रवृत्ति का तो उससे दुरी बनाये यदि सुधार की  तरकीब ही न हो तो घरेलू हिंसा के लिए कानून का सहारा लेने मे देर न लगाये किसी एक द्वारा की गयी हिंसा का असर दुरगामी हो सकता है जिससे बहुत से लोग इसकी दायरे में आ जाते है जिसका जिक्र मै अपनी पहले की पोस्टो आखिर कब तक संहूगी के भाग एक व दो में कर चुकी हो।स्कूलों में भी इन बातों की जानकारी देनी चाहिए जागरूकता किसी भी बुराई का बेहतर बचाव हो सकता है ।यदि किसी के घर में ऎसा हो भी रहा तो चुप रह कर तमाशा न देखे बुराई की अनदेखी बुरा्ई को बढावा, हमेशा याद रहे............।
written by Sunita Sharma (freelancer journalist)
( चित्र गुगल से साभार)                                                   _________________

8 comments:

  1. jagrook karta hua lekh....bahut achchha likha hai...

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  2. सुनीता जी, आज समाज बदल चुका है। किसी भी प्रकार का अत्याचार सहन करने का सवाल ही नही उठता। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है की हम अपने बच्चों को , भले ही बेटा हो या बेटी, आत्मनिर्भर बनायें, ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। पति पत्नी का रिश्ता भी नाज़ुक होता है और आपसी ताल मेल होना बहुत ज़रूरी है। जिसके लिए दोनों को प्रयास करना पड़ता है।
    अच्छा विषय लिया है अपने।

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  4. डा0 साहब आपने सही लिखा है शुरू से ही परवरिश ऎसी हो की व्यक्ति आत्मनिर्भर हो पर इस घरेलू हिंसा का शिकार कारपोरेट जगत मे काम करने वाली महिला हो या फिर एक काम करने वाली बाई ,बच्चे ,स्त्री ,पुरूष हो या बुजुर्ग काई भी नही अपवाद । आज सहनशीलता रिश्तों में न के बराबर है बच्चों मे भी हिंसक प्रवृत्ति पनपती जा रही है।लेकिन मै रिशतो में होने वाली हिंसा के सख्त खिलाफ हूं।

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  5. जीवन के कुछ गंभीर सवालों से जूझने का मोह दिखता है। इन सवालों के प्रति जागरूकता भी स्पष्ट है।

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  6. ... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!

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  7. Sunitaji,
    Maafee chahti hun,ki, pahle tippanee nahee de payi..tabiyat theek nahee thee..
    Mera bhi yah manna hai,ki, jab tak auton ke liye adhar gruh nahi bante,wo aawaaz uthake jayen kahan?

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  8. शादी से पहले व्यहार को जानना इतना सरल नहीं है शादी से पहले एक दुसरे का व्यवहार ऐसा लगता है जैसे एक दुसरे के लिए ही बने हों! पर शादी के बाद ही पता चल पाता है की असल व्यवहार क्या है!! घरेलु हिंसा बंद करने के लिए डाक्टर साहब की राय बिलकुल सही है ~!!!

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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