लम्हा लम्हा वक्त गुजरता रहा
क्या कहा उसने
इतना तो बता दिया होता
भुला तो दिया
दिल से जुदा कर दू
क्यों उसने क्या कर दिया
भूले से ही सही
कसूर तो बता देता
कर देता रुखसते मुहब्बत
अंधेरो में जो चिराग
जलाता रहा
खुद ही शुरू करता है ....
कहानिया वो रोज नई
कैसे कहे सितमगर से
नहीं भुला सकते उसको
हर पल जो याद आता रहा
लम्हा लम्हा वक्त गुजरता रहा
मशगूल रहा वो गैरो में
अपनों पर जुल्म करता रहा
चीखती है दीवारे मुझ पर
उसकी आवाज का जादू छाया रहा
कब टूटेगा तिलस्म .........
मायाजाल जो बुनता रहा
रहता है बेपरवाह सा
करते रहें दुआ फिर भी
उसे मिले हर ख़ुशी
चाहता वो जो रहा
लम्हा लम्हा वक्त
गुजरता रहा ...........!
क्या कहा उसने
इतना तो बता दिया होता
भुला तो दिया
दिल से जुदा कर दू
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भूले से ही सही
कसूर तो बता देता
कर देता रुखसते मुहब्बत
अंधेरो में जो चिराग
जलाता रहा
खुद ही शुरू करता है ....
कहानिया वो रोज नई
कैसे कहे सितमगर से
नहीं भुला सकते उसको
हर पल जो याद आता रहा
लम्हा लम्हा वक्त गुजरता रहा
मशगूल रहा वो गैरो में
अपनों पर जुल्म करता रहा
चीखती है दीवारे मुझ पर
उसकी आवाज का जादू छाया रहा
कब टूटेगा तिलस्म .........
मायाजाल जो बुनता रहा
रहता है बेपरवाह सा
करते रहें दुआ फिर भी
उसे मिले हर ख़ुशी
चाहता वो जो रहा
लम्हा लम्हा वक्त
गुजरता रहा ...........!
एक आह भी निकले अपनी
ReplyDeleteउसके लिए दुआ बन जाये।
क्या खूब दिल के उदगार प्रकट किये हैं।
उदासी में भी खूबसूरती है।
प्रेम का मायाजाल ऐसा ही होता है ...
ReplyDeleteभावपूर्ण लिखा है ...