Sunday, February 21, 2010


जख्म अब हंसते है
न जाने मुझसे क्या चाहते है।
हंसी है लबों पर फीकी सी 
 मायूसियो के दौर रहते है
जिन्दगी को खेल समझा
खिसकते पल हाहाकार 
करते है, थोडा ठहर जा वक्त
अभी सांस तो ले लूं
न बुलाओ मुझे 
चन्द लम्हे तो जी लूं
क्या है फलसफा जब
चाहो तो नही मिलता 
न चाहो तो सब कुछ पास तुम्हारे
नियति तेरे खेल न्यारे 
तुने खुब ठगा है
अब जख्म मुझ पर ही चिल्लाते .............है

8 comments:

  1. जख्म अब हंसते है
    न जाने मुझसे क्या चाहते है।nice

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  2. जख्म अब हंसते है
    न जाने मुझसे क्या चाहते है ...

    जख्म बस दर्द देना जानते हैं और चाहते हैं की उस पर भी इंसान हँसे ..... बहुत अच्छा लिखा है ......

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  3. थोडा ठहर जा वक्त
    अभी सांस तो ले लूं

    नियति तेरे खेल न्यारे
    अब जख्म मुझ पर ही चिल्लाते .............है

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया है आपने।

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  4. बेहतरीन। लाजवाब।

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  5. "जख्म अब हंसते है"
    ...
    "चन्द लम्हे तो जी लूं"
    अच्छे शब्द और भावनाएं - शुभकामनाएं

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  6. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  7. जख्म अब हंसते है

    जख्म़ अब हम पर हंसते हैं......या कहें कटाक्ष करते हैं....

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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