घरेलू हिंसा जो मुद्दा मैने उल्टा तीर पर उठाया किन्ही अपरिहार्य कारणो की वजह से उस ब्लाग पर नही पोस्ट कर रही हूं मैने आखिर कब तक संहूगी शीर्षक से लिखी पोस्ट में मैने घरेलू हिसां के कारणो व प्रवृत्तियों पर लिखा जिसमें यह लिखा कि किस तरह घरेलू हिंसा का शिकार व्यक्ति अपने काम पर भी ध्यान नही दे पाता किस तरह घरों में रिश्तों के दौरान हिंसा पनपती है। जहां तक मै समझती हूं कोई रिश्तों तब हिंसक हो उठता है जब उसे यह लगता है दूसरे को उसकी कोई परवाह नही जब पत्नियां पति पर हावी होने की कोशिश करे उसके परिवार की इज्जत न करे व उसे पलट कर जवाब दे पति की अनदेखी आथिर्क तंगी पति या पत्नी का अन्यत्र रूचि लेना। इसी तरह काई महिला भी परिवार भी तभी हिसंक होती है जब उसकी उपेक्षा हो या उसका व्यवहार ही इस तरह का हो, दंबग होना अपना रोब व परिवार में अपनी तानाशाही चलाना ,किसी भी व्यक्ति के हिंसक होने के पीछे वो मनोवेग भी कारण होते है जिन से वह आये दिन गुजरता है ,सबसे अहम रोल होता है माहौल का जिससे बच्चे ,बूढे ,रूत्री पुरूष सभी ...
sundar bhav.
ReplyDeleteजख्म अब हंसते है
ReplyDeleteन जाने मुझसे क्या चाहते है।nice
जख्म अब हंसते है
ReplyDeleteन जाने मुझसे क्या चाहते है ...
जख्म बस दर्द देना जानते हैं और चाहते हैं की उस पर भी इंसान हँसे ..... बहुत अच्छा लिखा है ......
थोडा ठहर जा वक्त
ReplyDeleteअभी सांस तो ले लूं
नियति तेरे खेल न्यारे
अब जख्म मुझ पर ही चिल्लाते .............है
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया है आपने।
बेहतरीन। लाजवाब।
ReplyDelete"जख्म अब हंसते है"
ReplyDelete...
"चन्द लम्हे तो जी लूं"
अच्छे शब्द और भावनाएं - शुभकामनाएं
जख्म अब हंसते है
ReplyDeleteजख्म़ अब हम पर हंसते हैं......या कहें कटाक्ष करते हैं....