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जिन्दगी.........

एक सवाल मन में 
आता है कभी-कभी
जिन्दगी इतनी 
दूर क्यों भागती है
जब कोशिश करू
छिटक देती है दामन
बिखर जाते है
हर ख्वाब मेरे
जो बस रह गये बाकी
जीने की हजार 
वजहे पर सामने
 आ जाती है.........
एक तूझे ही प्यार
क्यों है मुझसे
दो चार पल
होते है खुशी के मयस्सर
रच देती है 
अपना चक्रव्यूह
बेबस सी निगाहे
ताकती रह जाती है............
रह जाते है बस सवाल दर सवाल...........!

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मै तो खुशी का हमसाया हुं........

अपने गमो से कब तक भागोगे तुम एक दिन सब तुम्हारे पास आ ही जायेंगे, चीख कर कहेगे यह हम है जिनसे जिनसे तुम्हे बेपनाह प्यार है...........! खुशी को तुम कब तक तलाश करोगे देखों मै तुम्हारे करीब हूं फिर तुम मुझसे नाता क्यों तोडना चाहते हो,खुशी तो नकारा है.........! एक मै ही तो हूं जो तुम्हे घेरे रखता हूं वरना तो सभी रूसवा हो चले है दिल को तो समझा ही लेना  वह कब तक तुम्हे रोकेगा  एक दिन तो तुम्हे अपनाना ही होगा...... फिर कौन है इस दूनिया में तुम्हारा किसे अपना मानते, जानते हो कितने भोले हो, तुम खुशी के फरेब  को अब तक न समझ पाये ............... वही तो मुझे यहां ले आयी है उसका और मेरा तो बरसों पुराना साथ है ............ जहां खुशी जाती है मै छाया बन उसके पीछे -पीछे चलता हूं मै उसका साथ कभी नही छोडता  और तुम खुशी की तलाश में मुझको , सिर्फ मुझको पा लेते हो  अगर फिर तडपते हो, तो मेरा कहां  कसुर है मै तो बस.... खुशी का हमसाया हुं....................!!  

गैरो ने तो फिर भी गले लगाया है.....

आस्तीन में है कुछ सांप  डसने को है हर दम तैयार  इनको सर उठाने न दो  एक बार जो उठ गये  इनका डसना जरूर है। दोस्तो दोस्ती जरूरी है पर आस्तीन के सांपों से बचना भी जरूरी है। बेगानो की इस दूनिया में विश्वास कहां से पायेंगे जो करोगे भरोसा धोखा भी तो खायेगे.........। भरोसा एक नियति है इससे कब तक बच पाआगे  मेरे अपने कहां अपने बन पाये है  गैरों ने तो फिर भी गले लगाया है..........।

गूंजते है सन्नाटो में ......!!

अब वो बात कहा, जो कभी थी  गूंजते है सन्नाटो में  कह्कशे जोरो से  थी मुकमल कोशिश बस ....!! गमगीन सी है महफ़िल तेरी  वक्त कभी ठहरता नहीं  इंतजार कितना भी करो  जो आज है वो कल न होगा  जो कल होगा उसका बारे  क्या जान सका कोई कभी .....!!! परदे लाख डाल लो  सच पंख पसारता ही है  फिर टूटते है मासूम दिल  लगती है तोहमते वफ़ा पर  अब यहाँ क्या पायेगा  लाशो और खंडरो में  अतीत को क्या तलाश पायेगा  रहा एक सदमा सही, पर  हुआ यह भी अच्छा ही   चल गया पता अपनों में गैरो का  सभी अपने होते तो गैर  कहा जाते  अब तन्हाई में ख़ुशी का दीप जलता नहीं  बस है सिसकियाँ...और वीरानिया  देखना है वफाएचिराग जलेगा कब तलक   जो था गम अब उसकी भी परवाह नहीं..... l