Friday, February 18, 2011

मन से बोझिल है सारा जहां.....

मन से बोझिल है यह जहां सारा
चंचल कितना है यह मन.....
पल उडे ,पक्षी सी उडान 
पल में ठहरे यूं सागर सा
मन से चलता ,यह संसार
लडता है दिमाग .........
मन सा बावरा है क्या कोई
घबराता कभी तो कभी होता बचैन 
कभी प्रफुल्लित तो, नही कही चिन्ता........
कभी मरघट तो कभी महफिल.........
मन सा पागल कौन ।
लिखते कवि न जाने कितनी रचना
मन की थाह लेना न आसान
है यह रहस्य अनबूक्ष पहेली सा 
मन को पा सब को पा लो 
नही तो कौन जाने इस जग, जीवन में
 मन के मारो ने किये बडे बडे काम............।


6 comments:

  1. सच कहा , मन बड़ा चलायमान है ।
    यदि इसे बस में कर लें तो इंसान का दर्ज़ा ऊपर उठ जाता है ।

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  2. मन के वशीभूत न हो कर मन को वशीभूत करना चाहिए ..

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  3. मन के भटकने से ही रामयण और महाभारत दोनों हो गया..
    मन की चंचलता का अच्छा वर्णन

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  4. वाह !
    इस कविता का तो जवाब नहीं !

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  5. bas in duniya mein ek ye kaam hi aasaan nahi है ....
    man ko baandh liya to jeevan pa liya ... अच्छी rachna है ..

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  6. मैं उत्तराखंड से हूँ और अभी मैं डेल्ही हूँ मैं आपको ब्लॉग देखा मुझे बहुत अछा लगा मैं इंटर नेट पर रहता हूँ पर उत्तराखंड के 10 % लोग मुझे
    नेट पर मिलते है

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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