Thursday, January 27, 2011

गैरो ने तो फिर भी गले लगाया है.....

आस्तीन में है कुछ सांप 
डसने को है हर दम तैयार 
इनको सर उठाने न दो 
एक बार जो उठ गये 
इनका डसना जरूर है।


दोस्तो दोस्ती जरूरी है
पर आस्तीन के सांपों से
बचना भी जरूरी है।
बेगानो की इस दूनिया में
विश्वास कहां से पायेंगे


जो करोगे भरोसा धोखा भी तो खायेगे.........।
भरोसा एक नियति है
इससे कब तक बच पाआगे 
मेरे अपने कहां अपने बन पाये है 
गैरों ने तो फिर भी गले लगाया है..........।

10 comments:

  1. मेरे अपने कहां अपने बन पाये है
    गैरों ने तो फिर भी गले लगाया है..........।

    दिल का दर्द दर्शाती भावपूर्ण रचना ।
    अपनों का दिया दर्द ज्यादा दर्दीला होता है ।

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  2. सुंदर संदेश देती रचना।

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  3. बहुत प्रेरणा देती हुई सुन्दर रचना ...
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ !!

    Happy Republic Day.........Jai HIND

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  4. आप सभी को यह रचना पसन्द आयी धन्यवाद ।

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  6. मेरे अपने कहां अपने बन पाये है
    गैरों ने तो फिर भी गले लगाया है...

    वर्तमान में जीवन की सच्चाई तो यही है
    सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  7. दोस्तो दोस्ती जरूरी है
    पर आस्तीन के सांपों से
    बचना भी जरूरी है।
    बेगानो की इस दूनिया में
    विश्वास कहां से पायेंगे
    ...
    बहुत सार्थक प्रस्तुति..

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  8. दोस्ती जरुरी है पर आस्तीन के साँपों से बचना भी तो जरुरी है ...
    मगर आस्तीन के सांप पहचाने तो तभी जाते हैं जब आस्तीन में आते हैं !

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  9. बहुत सुंदर .....सार्थक भाव लिए रचना .....

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  10. "दोस्तो दोस्ती जरूरी है
    पर आस्तीन के सांपों से
    बचना भी जरूरी है"

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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