Tuesday, June 8, 2010

उस राह पर कैसे गुज़रे.................।


उम्मीदों से कहो दामन न छूटे...........
जो दर खुला है खुदा का
उस राह पर कैसे गुज़रे
कितना सकूंन है तेरे दामन में
के तू दिखता नही फिर भी मै तूझे महसूस करती हूं...........
पवित्र कितनी तेरी जमीन है
रूह को चैन बस तेरे पास ही मिलता है
इबादत कैसे करू इस काबिल भी तो नही
तूझ तक मेरी फरियाद पहुचे वजह भी तो नही...........
उम्मीदों से कहो हार न माने
जो सुनता है सबकी क्या वो यही कही है
कैसे तूझे पा लूं अब आस को आस कब तक रहे
जो दे मांगे जिन्दगी उसे मिलती नही
तंग दिल बोझिल है जो वह ढोये चले जा रहे है.................
जो दर खुला है खुदा का
उस दर तक कैसे पंहुचे
कितनी बार चाहा तू कैसे मिले
पर सिर्फ उम्मीद और उम्मीद इसके सिवा कुछ नही .........................।

11 comments:

  1. कितना सकूंन है तेरे दामन में
    के तू दिखता नही फिर भी मै तूझे महसूस करती हूं.
    Vah!! bdhad rohani aur ghoodh bat kahi aapne.

    ReplyDelete
  2. सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छी नज़्म है...बधाई...
    नीरज

    ReplyDelete
  4. आईये जानें ....मानव धर्म क्या है।

    आचार्य जी

    ReplyDelete
  5. उम्मीदों से कहो हार न माने
    जो सुनता है सबकी क्या वो यही कही है

    सुन्दर अहसास समेटे अच्छी रचना ।

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छा लिखा है आपने।
    मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-अपमान झेलती प्रतिमाएं। समय हो तो पढ़ें और प्रतिक्रिया भी दें-
    http://www.ashokvichar.blogspot.com

    ReplyDelete
  7. सुन्दर अहसास समेटे अच्छी रचना

    ReplyDelete

कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

Blog Archive

About Me