Sunday, February 7, 2010

चटकते है शीशे तो आवाज़ आती है 
दिल टुटे तो खनक भी नही
दस्तूर कैसा है यह इश्क का
जिसे जिन्दगी कहो वही मौत का समान है,


अपना लिया हर अन्दाज जिन्दगी का
जीने के लिए यह क्यो कर जरूरी था
वो कहता है साया हूं, है तो जुदा क्यों है?
साये से कहो , दूर रहे नजदीकी का विलाप नही


जुस्तजू है बस यह
काई रूठे तो मना लेना 
कही ताउम्र फिर रोना न पडे
पायलो की खनखन मिलती नसीबों से,
किसी घुंघरू को टूटने न देना ।

6 comments:

  1. चटकते है शीशे तो आवाज़ आती है
    दिल टुटे तो खनक भी नही
    दस्तूर कैसा है यह इश्क का
    जिसे जिन्दगी कहो वही मौत का समान है,

    वाह सुनीता जी लाजवाब लिखा है शुभकामनायें

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  2. दिल भी शीशा है जो बिना आवाज के टूटता है.
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. अच्‍छी अभिव्‍यक्ति...

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  4. roshn ydi krna hai
    in dil ke alavon ko
    to khud hee jlna hai

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  5. चटकते है शीशे तो आवाज़ आती है
    दिल टुटे तो खनक भी नही

    इसीलिए कहते हैं दिल नाज़ुक होता है।
    सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. पायलो की खनखन मिलती नसीबों से,
    किसी घुंघरू को टूटने न देना ।nice

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कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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