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याद जब भी कोई आता है......

याद जब भी कोई आता है  मन उदास हो जाता है । वैसे तो अपने कम ही है दोस्त जो मिले सब अच्छे मिले.... वक्त ने कभी हौंसला न दिया पल भर बात कर सके  वजह भी तो कभी न पायी........ भावनाओ के अथाह समन्दर में  डूबते है उतरते है पार जाने  की कितने ही कोशिशों में बस नाकाम से नजर आते है। याद जब भी आती है गमगीन नजारे हो जाते है यादों से परे रहने का  अटूट फैसला जो किया है।  कब तक अमल कर पायेगे जिन्दगी से दूर कब भाग  पायेगे भटकेगे फिर इन्ही अन्धेरों में रोशनी की सहर कहां पायेगे...... . ......!

मन से बोझिल है सारा जहां.....

मन से बोझिल है यह जहां सारा चंचल कितना है यह मन..... पल उडे ,पक्षी सी उडान  पल में ठहरे यूं सागर सा मन से चलता ,यह संसार लडता है दिमाग ......... मन सा बावरा है क्या कोई घबराता कभी तो कभी होता बचैन  कभी प्रफुल्लित तो, नही कही चिन्ता........ कभी मरघट तो कभी महफिल......... मन सा पागल कौन । लिखते कवि न जाने कितनी रचना मन की थाह लेना न आसान है यह रहस्य अनबूक्ष पहेली सा  मन को पा सब को पा लो  नही तो कौन जाने इस जग, जीवन में  मन के मारो ने किये बडे बडे काम............।

वो होठो से तो कुछ कहेगी नही.........।

वो होठो से तो कुछ कहेगी नही देख मेरे हालात जाने क्या समझेगी........। दूरिया आज क्यो है? कल क्या था जो करीब थे............। चुपके से छोड देगी मेरे दर को  जाने कहां उसकी सहर होगी.........। जो करते है अपनी खुशी कुर्बान  क्या दूसरों को खुशी दे पाते है........। करते है ढोग जीने का ढंग से मर भी नही पाते है.........। वो कह देगी अलविदा बदल कर अपना रस्ता  मेरा सफर दोस्त कठिन जरूर है............। यहां नफरत नही प्रेम से रोशन जहां है एक दूनिया है ऎसी जहां मासूमियत है.........। नही है चलाकियां दूनिया की उससे कहो वह अपना रास्ता बदल दे.......। गुमराह करे इससे पहले कोई उसे  वापस उसका हसीन दूनियां में आने का इन्तजार है.........। 

गैरो ने तो फिर भी गले लगाया है.....

आस्तीन में है कुछ सांप  डसने को है हर दम तैयार  इनको सर उठाने न दो  एक बार जो उठ गये  इनका डसना जरूर है। दोस्तो दोस्ती जरूरी है पर आस्तीन के सांपों से बचना भी जरूरी है। बेगानो की इस दूनिया में विश्वास कहां से पायेंगे जो करोगे भरोसा धोखा भी तो खायेगे.........। भरोसा एक नियति है इससे कब तक बच पाआगे  मेरे अपने कहां अपने बन पाये है  गैरों ने तो फिर भी गले लगाया है..........।

भड़ास blog: आखिर कब तक सहूंगी......

आखिर कब तक सहूंगी.......  http://bhadas.blogspot.com   पर   की इस कड़ी को पढे........

तू बता दे मुझे जिन्दगी.....

तू बता दे मुझे जिन्दगी कौन सा है मोड़ , जहां मुलाकात तो होगी एक तू है एक मै हूं दोनो की कशमकश की कभी तो हार होगी तू बता मुझे जिन्दगी इस बियाबां में किसकी दरकार करती है यहां आवाज  क्या सुनायी जाती है यहां अंधेरे रोशनी को हर पल तरसा करते है तू बता दे मुझे जिन्दगी इस रात की कभी तो कभी सुबह होगी तेरा दामन पकडा है अब अन्जामें वफा क्या होगी तू बता दे मुझे जिन्दगी किस गुनाह की सजा क्या तूने तय की है न जाने कब क्या हो हर पल खौफ के साये में पलती है जिन्दगी तू बता दे मुझे जिन्दगी आसमां में क्या तलाशती है यहां चाहत की इबारत पत्थरों से लिखी जाती है जो कर यह गुनाह उस क्यों मौत की आरजू न होगी.................

कोई तो है.................।

कोई  तो है जो कहे  चलो चार कदम मेरे साथ इस दुनिया में वरना  कहां अपनों को तलाश करे कैसे कहे जख्म कितने खाये है अजनबियों से कहो  उन पर भरोसा कैसे करे हर कदम सोचे तो उठाये जिन्दगी को कह दो न इतराये कभी -कभी जिन्दगी भी साथ छोड देती है कौन है फिर अपना वो साया  कही खुद की परछाइयाँ तो नही  सच किसे मान लूं मै या मेरी परछाई कौन चलता है साथ-साथ तू ही तो एक अपनी है जो अन्त तक साथ निभायेगी  वरना तो सबकुछ धुआं हो जायेगा न तुम होगे न कोई गम सताने वाला वो जो तन्हाई का सहारा है वही तो बस एक अपना है जग झूठा ,जीवन, जीने मरने का फेरा है मान लो मेरी बात सच कुछ नही  बस एक सच है, जो आज है, वो कल न होगा...........।