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किसका चेहरा देखू तेरे चेहरे के बाद............।

किसका चेहरा देखूं तेरे चेहरा देख कर सजदा तूझे है मेरी हर ख्वाहिश के लिए नूर है तू ,इस जहां में कोई तेरे मुकम्मल नही.............। तेरे दम से कयामत है तेरे दम से दूनिया है मेरा तेरा कुछ नही रह जाना बस नाम तेरा किसका ओज है तेरे ओज सा..............................। किसका चेहरा देखू तेरा चेहरा देख कर वो कौन खुशनसीब है जो तेरा दीदार करता है हम तो बस ख्वाबों की दरकार करते है..................। तेरे दम से कलम स्याह होती है वरना मेरी कलम तो खाख है मेरे खुदा तू कब मुझे अपना अक्स दिखायेगा.......................? किसका चेहरा देखु तेरा चेहरा देख कर इन्तजार तेरा सिर्फ तेरा है तू मेरी जुस्तजू है सिर्फ आखिरी ख़्वाहिश है..............................।                        ..........................

नित नवीन सृजन करे.....!

नव वर्ष नव कल्पना  नित नवीन सृजन करे । खिले फुल महके गुलशन  सरस किरणों का स्वागत करे ......................! गुजित भंवरे,गुनगुन स्वर  रिमझिम फूहार की कामना करे  जीवन हो सरल दिशायें दीप्तमान नवीन प्रहर का इन्तजार करें........!   नव वर्ष नव कल्पना  नित नवीन सृजन करे दुख भ्रम की किचिंत छाया न हो सुखों की अल्पविराम रागिनी हो एक नवगीत को साज आवाज दे.... ....................! नव वर्ष नव कल्पना  नित नवीन सृजन करे। 

खुदाया मुझे रहमतो का एक समुन्दर दे दे.................

खुदाया मुझे रहमतो का एक समन्दर दे ............ डूब जाउ मै तेरी इबादत में इतना के कोई मुझे हटा न सके। खुदाया मुझे उजली धुप का आंगन दे दे। रख सकूं हर एक महरूम हो चुके, खुशी से बन्दे को  एक जमी ऎसी जहां नफरत पांव न जमाती हूं सिर्फ तेरी नूर से सरोबार दीवारे हों खिलते हो फूल चट्टानों पर भी मुस्कुराता एक गुलशन दे दे। वो जो देखा था अक्स तेरा हर दीदार में वो नजर दे दे। तेरी इबादत में लूटा दूं अपना सबकुछ तू सिर्फ एक झलक दे दे। खुदाया मुझे रहमतों का एक समुन्दर दे दे...............।

धुंध.............

धुंध- धुंध, धुआ- धुआ.........। जिन्दगी बढती गयी कांरवा चलता गया दूर तक खामोशी और साये आहटे बढती हौले हौले............। रफ्तार जो थमती नही  आसुओ की रौ तन्हाईया शोर मचाती है। सारी परेशानियों का सबब ऎ दिल अब तो संभल बहके कदमों को संभाले चलते रहे बस चलते रहे...........। किसकों पुकारे इस राह पर देखो कितना अंधियारा है रफता रफता वक्त कटता गुम होता उजियारा.........। पुरवाई से कहो यहां न आये तेरा दर यहां से दूर है। दबे पांव मुस्कुराते है हौठं  मुस्कुराहट बैरी है। धुंध-धुंध धुआ -धुआ ............. ...।

एक शाम .......

एक शाम और तुम, दोनो कितने करीब हैं। किसे भूले किसे याद करे दोनो मेरे अपने है........ डुबता सूरज और समन्दर जैसे डुबती हर सांस है एक पल और एक गम दोनो मेरे अपने है............. किसे भूले किसे याद करे फासले बढते जाते है रह नुमा वो नही  सैलाब है हर तरफ अंधियारा घिर आये............ कैरे सवेरे की राह तके किसे भूले किसे याद करे  वक्त बहा ले जाता है............................. गम एक दरिया, मौजो का आना जाना  एक बूत और चट्टान  किसे भुले किसे याद करे.................... .।             _______

उडान

बन्द होती सांसे यूं जीना भी कोई जीना है फडफडाते है पंख छूने को आकाश नये कुतरे पंख कैसे काई उडान भरे........ ! नन्ही चीडियां रश्क तूझसे  मिला खुला आकाश तूझे हवा भी कुछ कहती हौले-हौले......  ! टूटते बांध आशाओं के बन्द हो जाते  दरवाजे खुलने वाले एक मंजिल पा कर मंजिलों से दूरी है...... ! उम्मीद कहती हौले से कानों में तू क्योकर उदास है कोई सवेरा कोई सहर दाखिल होती ही है सफर बोझिल जरूर पर कट तो रहा है....... ! कतरे पंख ही सही उडान तो भर  आस मां देखता है राह तेरी बंधी मुठ्रठी खोल तो जरा फिर न कहना कही रोशनी नही...... ! एक दीप जला तो जरा पग पग धर, धरा नप जाये हौसला कर कदम तो बढा. ...................!        _______

आखिर कब तक सहूंगी.....(.अन्तिम भाग) जागरूकता व बचाव

जब घर में ही हिंसा की शिकार महिलाओं से मैने उनके विचार जानने चाहे किसी भी आम हिन्दुस्तानी औरतों की भांति ही उनके विचार थे यह कहना है आखिर हम आवाज उठाये तो किसके खिलाफ जा उनका पति या परिवार है चाहे वो भाई  हो या अन्य काई पति से जन्मजन्मातंर का रिश्ता होता है  वह उनके खिलाफ कैसे जा सकती है मेरी एक परिचिता जो पेशे से डा0 है खुद कहती है कि कुछ रिश्ते ऎसे होते है जेसे पति ,भाई कोई महिला इनसे लड नही सकती इनकी बातो को सहने के अलावा उनके पास अन्य कोइ रास्ता नही होता।इसलिए विरोध करने से अच्छा या तो अनुसरण करो या फिर सहते रहो। यह तो बात रही सहन करने की,लोगो का भी यह मानना है जो सहते है घर भी उन्ही के बचे रहते है जो नही सह पाते उनके घर बिखर जाते है क्योकि यदि घरेलू हिंसा को रोकने में जब कानून का सहारा लिया जाता है तब दौर शुरू होता है टूटने व बिखरने का काई भी व्यक्ति यह विश्वास नही कर पाता कि पीडित या पीडिता यदि कानून की शरण मे गयी है तो फिर रिश्ते समाप्ति के कगार पर आ पहुँचते है यदि कानून द्वारा रिश्तों  का बरकरार भी...