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आखिर कब तक सहूंगी......भाग दो

घरेलू हिंसा जो मुद्दा मैने उल्टा तीर पर उठाया किन्ही अपरिहार्य कारणो की वजह से उस ब्लाग पर नही पोस्ट कर रही हूं मैने आखिर कब तक संहूगी    शीर्षक से लिखी पोस्ट में मैने घरेलू हिसां के कारणो व प्रवृत्तियों पर लिखा जिसमें यह लिखा कि किस तरह घरेलू हिंसा का शिकार व्यक्ति अपने काम पर भी ध्यान नही दे पाता किस तरह घरों में रिश्तों के दौरान हिंसा पनपती है। जहां तक मै समझती हूं कोई रिश्तों तब हिंसक हो उठता है जब उसे यह लगता है दूसरे को उसकी कोई परवाह नही जब पत्नियां पति पर हावी होने की कोशिश करे उसके परिवार की इज्जत न करे व उसे पलट कर जवाब दे पति की अनदेखी आथिर्क तंगी पति या पत्नी का अन्यत्र रूचि लेना। इसी तरह  काई महिला भी परिवार भी तभी हिसंक होती है जब उसकी उपेक्षा हो या उसका व्यवहार ही इस तरह का हो, दंबग होना अपना रोब व परिवार में अपनी तानाशाही चलाना ,किसी भी व्यक्ति के हिंसक होने के पीछे वो मनोवेग भी कारण होते है जिन से वह आये दिन गुजरता है ,सबसे अहम रोल होता है माहौल का जिससे बच्चे ,बूढे ,रूत्री पुरूष सभी ...
कुछ भी न कह कर बहुत कुछ कह जाते है सबने सताया जी भर कर, अब तो गमों  को भी शर्म आती है हम पर! आदत जो होती है उसे मिटा ना कैसे कत्ल होता है अरमानों का देखो फितरत दूनिया कितनी मासूम है ! बांध  कर हाथों को क्या तलाश है वो मुकाम कहा रास्ता कहां कुछ भी न कर कह कर बहुत कुछ कह जाते है। हमने बना दिया मूरत को भी इन्सा  है काफी दम खम हममें वो छीन लेता है हर खुशी मुझसे  कैसा  हमसफर है मेरा मार डालता है कहकर, जिन्दगी  दे रहा हूं तूझे !
मासूम चेहरो से, डर लगता है इनकी तल्खी, शोखिया, अदाये होती है कातिलाना चेहर, जो चलाते है नश्तर कैसे कहूं इन नश्तरों से डर लगता है मासुम आंखे दिलों में चलाकिया चलाकियों से, डर लगता है! कत्ल कर जाते है खामोशी से उफ! भी नही जरा, मासूम चेहरो से दूर रहना है इनकी जिदे ,इनकी दीवानगी रो कर हर बात मनवा लेना चेहरों ने गुनाह करवाये है ! आइना दिखा देता है फितरत एक दिन सौ बार जो मुंह छिपाये है ! मासूम चेहरों से डर लगता है ! होती है इनकी बाते निराली हर शह को दूर कर दो चेहरों पर लगे है चेहरे , बन्द कर लिया है आंखो को हां ! मासूम   चेहरों से डर लगता है..... .।
हर रोज एक नया गम दो मुझे गमों  की आदत है आज  ये पास नही..... ....  ! ये क्योकर मुझसे दुर है बस पत्थर ही मारों दोस्तो न ही मैं नूर हूं न  ही सरूर हू! कही उठा कर एक कोने में रख दो दोस्तों किसी की ग़ल्तियाँ और माफ़ी ?  जमी मेरे किस काम की! दूर फलक पर घर बना दो मुझे एक चादर सिला दो आओ गले लगा लू तुम्हें! पल भर भी दुर न हो क्या ढुढता है अब ये दिल साया भी जुदा हो चुका है दोस्तों ! उसके सितम की कोई हद तो होगी,अब तो सितमों शह ढूढंता हू दोस्तों........!               -----------
आज फिर दिल रोया है बार-बार छलछलाते अश्क कह देते हर बात जख़्मी सांस, क्यो फरेब सहता है मन? क्या है रोक लेता है जो कदमों को  बार-बार किस तरह खेलते है लोग दिलों से कर देते है बस चकनाचुर आज फिर गमों का दौर आया है  हसरतों का टूटना ,बिखरना  मरना फिर जी लेना  ख़ुशियों क्यों छीन लेते है लोग क्यों नही समझ पाता कोई मन?    आज फिर दिल टुटा है यहां आवाज़ नही साज़ नही खामोशी ओर बस  घुटन....................              ---------

तुम !

हौले से आकर जगा देते हो मुझे ख्वाब में ही सही,उपस्थित दिखा देते हो तुम तुम जो अरमान थे, तुम जो जीवन थे! आज जो अभिशाप बन गये हो तुम हौले से आकर कानों में कुछ कहते हो तुम बुदबुदाते शब्द बनते जाते कहर! उपर एक आसमां, क्या तलाशतें हो तुम हौले से चैन छीन लेते हो तुम झुठे ही सही ,तसल्ली दे जाते हो तुम ! तुम जो विश्वास थे, छल जो बन गये तुम क्या करे अब परिभाषित, भुल जाओ तुम  प्रेम जो सच था उसे खो  चुके तुम !           _________

क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम.....?

क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है हम किन लोगो मे जीवन गुजारते है हम रिश्ते जो सिर्फ देते है दर्द उन रिश्तों  क्या सोच निभा रहे है हम खुन जो हो जाता है  पानी है  क्षणिक स्वार्थ कर देता है सब होम दुहाई देते रहे बस, क्या मेरा क्या पराया क्यो रिश्तों को तिथियों में बांध देते है हम झलकता जो प्रेम आंखों से नफरत कैसे सह पाते हम क्यों रिश्तों को रो लेते है हम  इन्सानों की इस दुनिया में  लेन देन कर बना लेते फरेब की एक दुनिया दुनियादारी का नाम ले रिश्तों को तोल लेते हम  क्यों रिश्तों के नाम पर ठोकरे खा रहे है हम जो आज है वो कल न होगा  तकलीफों को सहन कर क्यों जिये जा रहे है हम।                 ____________