न दिन का पता न रात की फिक्र

न दिन का पता न रात की फिक्र
यह कौन से मुकाम पर आ पहुंची है जिन्दगी
अपनी कहे या उसकी सुने
कैसा मजाक कर रही है जिन्दगी
वक्त है जो ठहरता नही
बस रोने का सवाल बनती है जिन्दगी
न यकीन जमाने पर करो दोस्तों
यकीनो का कुछ नही होता
कौन अपना कौन पराया ?
किसे अपनाये किसे ठुकराये
सवाल पर सवाल बनी है जिन्दगी
न दामन भरा है न खाली ही हाथ
कितने अचरज से भरी है जिन्दगी
अपनी कहे या उसकी सुने
कैसा मजाक कर रही है जिन्दगी.................।
कर दिया खुद को वक्त के हवाले
अब क्या रंग दिखायेगी जिन्दगी
चांद-तारों के बाते किताबी है
किताबो से नही चलती जिन्दगी...........................।

कभी बहुत ही भावपूर्ण हो जाते है जज्बात हमारे हमारी भावनाये जिन पर जो चाहो कोई जोर नही इ

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